मैं हूँ भी और नही भी....
ये बारिश की बूंदें जो गिरी हथेलियों पर,
दिल मे बसे जज्बातों को गीला कर गई,
बुलबुले पानी में बनते, लेकिन हैं ये कल्पित,
बुलबुला हूँ शायद, मैं हूँ भी और नही भी...
बादलों के बदलते आकार हर पल,
जैसे बदलते स्वप्न हो किसी बालक के।
चलते साथ हो पालक जैसे, जो ठहरे थोड़ा तो समझूं,
आकार हूँ शायद, मैं हूँ भी और नही भी...
वृद्ध सा नतमस्तक जग जब गिरे धरा पर,
विरह अभ्र से लाजिमी, जो शीतल करना हो धधक भू की
खलिहानों में कोंपल हों, मन में विचार के मानिंद,
विचार हूँ शायद, मैं हूँ भी और नही भी...
बूंद का भविष्य क्या जब गिरे वो नभ से,
सीप में हो तो मोती भी और गंगा में हो तो अमृत भी,
तालाब में है तो विराम, और दरिया में है तो वेग भी।
भविष्य हूँ शायद, मैं हूँ भी और नही भी...

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