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When Audience went wrong - Part I

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Top 10 Hindi Movies of last Decade (2010-2019) which failed at BO  First thing first, It has nothing to do with what critics said about the movie or how much the movie has earned at Box-office(BO). This is an entirely personal list and I have rated based on how I felt after watching the movie and how it affected me over a period of time.  There were a few movies which I liked but they were liked by many others too and found their audience so you may not find those films on this list. Most of these films failed at Box-office and were not popular in the mainstream. So without wasting time lets start. 1. MASAAN (2015) Cast : Richa Chaddha, Pankaj Tripathi, Sanjay Mishra, Vickey Kaushal, Shweta Tripathi Director : Neeraj Ghaywan Synopsis : Four lives intersect along the Ganges: a low caste boy hopelessly in love, a daughter ridden with guilt of a sexual encounter ending in a tragedy, a hapless father with fading morality, and a spirited child yearning for a family, long to e...

दिन और रात

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सुबह चाय की प्याली तेरी जब चर्चा करे, होठों की छुअन जब प्याली पर हो, अवचेतन मन मे चेतना हो जैसे, और फिर तेरा जिक्र मन मे गहरा जाये। दोपहर करे प्रतीक्षा तेरी, अरुणाई सी खिले, हरारत तेरी धड़कनों में स्पंदन जैसी जीवित, अल्प परछाई, लिप्त सत्यतता से, आसक्त हूँ अतृप्त नहीं , लेकिन अंतर्नाद है विस्मित। सांझ में अस्तित्व तेरा जब दे आहट आसमाँ में, सामर्थ्य शाम की, रात और दिन को पृथक करे, मंद होता प्रकाश, आशा किंचित, दो नयन जैसे मिले नही, पर साथ रहे। रात स्वप्न में, तेरे साये का अहसास, उस तिमिर में तस्वीर एक धुंधली सी, जुस्तजू मिलन की जो निरर्थक, कहकशां नवस्वप्न है तम में।

फिर हर तरफ अंधेरा क्यूँ।

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रोज अखबार वही है आता, उसमें वही है खबरें क्यूँ, जो अगर नई भी होती, तो भी अनागत नहीं बदलता क्यूँ, और अगर पुरानी रहती, तो आगत से है निराशा क्यूँ, तुम तो कहते हो कि ये है दिन, फिर हर तरफ अंधेरा क्यूँ। दिल है अगर अंग शरीर का ,मोहताज किसी की मोहब्बत का क्यूँ, जो अगर मिल भी जाये, तो फिर खोने का डर क्यूँ, और अगर न मिले तो, उस से मिलने की तड़प भी क्यूँ, तुम तो कहते हो कि ये है दिन, फिर हर तरफ अंधेरा क्यूँ। रिश्ते निभाये प्रेम और मोह से, ऐसे लोगो की चाह है क्यूँ, जो अगर निभाये तो, उनकी कद्र नही है क्यूँ, और अगर न निभाये तो, गिले शिकवे और शिकायत भी क्यूँ, तुम तो कहते हो कि ये है दिन, फिर हर तरफ अंधेरा क्यूँ। हर वक़्त सभी से आगे निकले, ऐसी होड़ लगी है क्यूँ, जो अगर निकले भी तो, अगली मंज़िल की है तलाश क्यूँ, और अगर न निकले तो, इतनी मायूसी भी क्यूँ, तुम तो कहते हो कि ये है दिन, फिर हर तरफ अंधेरा क्यूँ। हम भी वही हैं हालात वही, ज़िंदा रहते हैं ये क्यूँ , जो अगर अलग भी होते तो, नही बहलता ये दिल क्यूँ और अगर वही ह...

क्या ज़िन्दगी से बड़ा कोई गुरु है।

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क्या ज़िन्दगी से बड़ा कोई गुरु है। शायद नही। सामान्यत: जिन्हें हम गुरु कहते हैं वो पाठ पढ़ाते है और परीक्षा लेते हैं। उस परीक्षा में या तो आप उत्तीर्ण होते हैं या  अनुत्तीर्ण। ये एक नियम है जिस से हम सब परिचित हैं अपने स्कूल के समय से। ज़िन्दगी इस से थोड़ी जुदा है, वो परीक्षा लेती है हर पल और एक नया पाठ पढ़ा जाती है अगली परीक्षा के लिए। इस परीक्षा में न कोई उत्तीर्ण होता है ना  अनुत्तीर्ण। हर परीक्षा है एक नए अनुभव के लिए। ज़िन्दगी है तो अनुभव हैं। कुछ अच्छे हैं तो कुछ कटु। अच्छे अनुभव हम सहेज कर रखते हैं, किसी के साथ ज्यादा बांटते नही है। लोगों के अंदर ऐसी धारणा है कि इन्हें साझा करने से उनका कोई निजी अहित हो जायेगा। बुरे अनुभव हम पूरे आत्म विश्वास के साथ साझा करते हैं, जैसे ये बांटने से कम हो जाएंगे। अनुभव कैसे भी हो वो हमारे निजी हैं लेकिन साझा हर तरह के अनुभव करने चाहिए, शायद वो किसी और के लिए किसी और परीक्षा में काम आ सके, या जिस से आप साझा कर रहे हैं वो आपको उसका कोई नया दृष्टिकोण दे सके जो आपने देखा ही नही कभी और अच्छा अनुभव बुरे ...