फिर हर तरफ अंधेरा क्यूँ।


रोज अखबार वही है आता, उसमें वही है खबरें क्यूँ,
जो अगर नई भी होती, तो भी अनागत नहीं बदलता क्यूँ,
और अगर पुरानी रहती, तो आगत से है निराशा क्यूँ,
तुम तो कहते हो कि ये है दिन, फिर हर तरफ अंधेरा क्यूँ।

दिल है अगर अंग शरीर का ,मोहताज किसी की मोहब्बत का क्यूँ,
जो अगर मिल भी जाये, तो फिर खोने का डर क्यूँ,
और अगर न मिले तो, उस से मिलने की तड़प भी क्यूँ,
तुम तो कहते हो कि ये है दिन, फिर हर तरफ अंधेरा क्यूँ।

रिश्ते निभाये प्रेम और मोह से, ऐसे लोगो की चाह है क्यूँ,
जो अगर निभाये तो, उनकी कद्र नही है क्यूँ,
और अगर न निभाये तो, गिले शिकवे और शिकायत भी क्यूँ,
तुम तो कहते हो कि ये है दिन, फिर हर तरफ अंधेरा क्यूँ।

हर वक़्त सभी से आगे निकले, ऐसी होड़ लगी है क्यूँ,
जो अगर निकले भी तो, अगली मंज़िल की है तलाश क्यूँ,
और अगर न निकले तो, इतनी मायूसी भी क्यूँ,
तुम तो कहते हो कि ये है दिन, फिर हर तरफ अंधेरा क्यूँ।

हम भी वही हैं हालात वही, ज़िंदा रहते हैं ये क्यूँ ,
जो अगर अलग भी होते तो, नही बहलता ये दिल क्यूँ
और अगर वही है रहते तो, रहती इतनी मन में अनबन क्यूँ,
तुम तो कहते हो कि ये है दिन, फिर हर तरफ अंधेरा क्यूँ।

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